भ्रामरी देवी भद्रकाली शक्तिपीठ
महाराष्ट्र के नासिक स्थित भद्रकाली मंदिर प्रधान 51 शक्तिपीठों में से एक और हिन्दू श्रद्धालुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल है | यह मंदिर स्टेशन से नासिक रोड पर 8 किमी की दुरी पर एक पहाड़ी पंचवती पर स्तिथ है |
सती कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव को अपमानित होते देख माता सती ने जब हवन को खुद को भस्मीभूत कर लिया तो त्रिकालदर्शी शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर लेकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भ्रमण करने लगे. तब भगवती सती के शरीर से ठुड्डी नासिक के इसी पवित्र स्थान पर गिर पड़ी थी और देवी सती यहां महाशक्तिपीठ के रूप में स्थापित हो गई.
यहां भगवती देवी भ्रामरी रूप में जबकि भगवान भोलेनाथ (भैरू ) विकृताक्ष के रूप में प्रतिष्ठित हैं |
माता के इस मंदिर में शिखर नहीं है. यहां पर नवदुर्गा की मूर्तियां हैं जो नौ पहाडियो का के संकेट रूप में है और उनके मध्य में भद्रकाली की ऊंची मूर्ती है. माता के इस प्रसिद्ध शक्तिपीठ भद्रकाली मंदिर में माता के दर्शन-पूजन का बड़ा महत्व है. मान्यताओं के अनुसार माँ के इशारे पर ही भक्त दर्शन हेतू आ सकते है और श्रद्धापूर्वक की गयी पूजा से वे भद्रकाली माँ के कृपापात्र होते है |
इस शहर का नाम नासिक कैसे पड़ा ?
इस जगह नौ छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हैं, जिनके कारण इसका नाम पड़ा-'नव शिव', जो धीरे धीरे समय के साथ बदल कर 'नासिक' हो गया | मंदिर की स्थापना : 1790 के करीब इस्लाम शासन में मूर्ति अपमानित न हो इसी कारण सरदार गणपत राव दीक्षित ने बिना शिखर का और बिना कलश स्थापना के यह मंदिर पहाड़ी पर बनवाया | माँ के 18 भुजाओ में 18 तरह के अस्त्र शस्त्र है |
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